Namaz ke Zaroori Masail - Ahkam e Namaz

Namaz ke Zaroori Masail – Ahkam e Namaz

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नमाज़ हर मुसलमान मर्द औरत पर फ़र्ज़ है

ज़ोहर की नमाज़ के जरूरी मसाइल

( 1 ) 【मस’अला】 ! अगर किसीने ज़ोहर की जमाअत के पहले की चार ( 4 ) रकाअत सुन्नते न पढ़ी हो और जमाअत कायम हो जाए तो जमाअत में शरीक हो जाए जमाअत के बाद दो ( 2 ) रकाअत सुन्नत बा’दिया पढ़ने के बाद चार सुन्नत पढ़ले ( फतावा राज़वीय जिल्द न 3 सफहा न 617

( 2 ) 【मस’अला】!अगर चार रकाअत सुन्नते मोअक़ैदा पढ़ रहा है और जमाअत क़ाईम हो जाए तो दो ( 2 ) रकाअत पढ़ कर सलाम फैर दे और जमाअत में शरीक हो जाए और जमाअत के बाद दो रकाअत सुन्नत बा’दिया के बाद चार ( 4 ) रकाअत अज़ सरे नौ ( नये सिर से ) फिर से पढ़े ( फतावा रजविया जिल्द न 3 सफहा न 611)

( 3 ) 【मस’अला】! ज़ोहर की नमाज़ के फ़र्ज़ से पहले जो चार ( ४ ) रकाअत सुन्नते मोअक़ैदा हैं वोह एक सलाम से पढ़े और क़ाद ऐ उला पहला क़ा’दा में सिर्फ अतहिय्यात पढ़कर तीसरी रकअत के लिये खड़ा हो जाना चाहिये और अगर भूल कर दरूद शरीफ अल्लाहुम्मा सल्ले अला मुहम्मदिन, या अल्लाहुम्मा सल्ले अला सय्येदेना पढ़ लिया तो सजद ए सहव वाजिब हो जाएगा इलावा अज़ी ( वीशेष ) तीसरी रकअत के लिये खड़ा हो तो सना और तअव्वुज़ भी न पढे ज़ोहर की नमाज़ के फ़र्ज़ के पहले की इन सुन्नतो की चारो रकअत में सुर ए फातेहा के बाद कोई सूरत भी जरूर पढ़े। ( दुरे मुख्तार बहारे शरीअत हिस्सा न 4 सफहा न 15 और फतावा रजविया जिल्द न 3 सफहा न 636 मोमीन की नमाज़ पेज 178)

(4 )【मस’अला】! किसी को ज़ोहर की नमाज़ की जमाअ़त की सिर्फ एक ही रकाअत मिली या’नी वोह शख्स चौथी रकाअत में जमाअत में शामिल हुआ, तो इमाम के सलाम फैरने के बाद वोह तीन रकअत हस्बे ज़ेल तरतीब ( पद्रति method ) से पढ़ेगा,

इमाम के सलाम फैरने के बाद खड़ा हो जाए, अगर पहले सना, न पढ़ी थी तो अब पढ़ ले, और अगर पहले सना, पढ़ चुका है तो अब सिर्फ अउजो से शूरू करे, और पहली रकअत में सुर ए फातेहा और, सूरत दोनो पढ़ कर रुकूअ और सुज़ुद करके का’दा में बैठे, और का’दा में सिर्फ ‘ अतहिय्यात पढ़ कर खड़ा हो जाए, फिर दूसरी रकअत में भी सुर ए फातेहा और सूरत दोनो पढ़ कर रुकूअ और सुज़ुद करके बगैर का’दा किए हुए तीसरी रकअत के लिये खड़ा हो जाए और तीसरी रकाअत में सिर्फ अल हम्दो शरीफ पठ कर रुकूअ और सुज़ुद करके का’द ए आखिरा, करके नमाज़ तमाम पूरी करे

( दुरे मुख्तार बहारे शरीअत हिस्सा न 3 सफहा न 136 और फतावा राज़वीया जिल्द न 3 सफहा न 393/396 मोमिन की नमाज़ पेज 179)

नोट : नामजे असर और ईशा में भी इसी तरतीब से पढ़े

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( 5 ) 【मस’अला 】! ग़ुरूब आफताब के बीस ( 20 ) मिनट पहले का वक़्त ऐसा मकरूह वक़्त है, कि उसमें कोई भी नमाज़ पढ़नी जाइज़ नही, लैकिन अगर उस दीन की असर की नमाज़ नही पढ़ी तो उस वक़्त भी पढ़ ले अगरचे आफताब ग़ुरूब हो रहा हो तब भी पढ़ ले, लैकीन बिला उजे शरई इतनी ताखीर ( विलम्ब ) हराम है हदीस में इसको मुनाफिक की नमाज़ फरमाया गया है, ( आलमगीरी, बहारे शरीअत हिस्सा 3 सफहा 21)

( 6 ) 【मस’अला】! मस’अला असर की सुन्नते शुरू की थी और जमाअत क़ायम हो गई तो दो ( 2 ) रकाअत पढ़कर सलाम फैर दे और जमाअत में शरीक हो जाए, सुन्नतों के एआदा की जरूरत नही, ( फतावा रजविया जिल्द न 3 सफहा न 611 मोमीन की नमाज 186)

! जियादह जान नेके लिए आप मोमीन की नमाज़ का मुताला करे

( 7 )【 मस’अला】! असर की नमाज के फर्ज़ के पहले जो चार ( 4 ) रकाअत है, वोह सुन्नते गैर मोअक़ैदा है, इन चारों ( 4 ) रकाअतो को एक सलाम से पढ़ना चाहिए और दो ( 2 ) रकाअत के बाद का’द ए उला’ (पहला का’दा) करना चाहिये और का’द ए उला में अतहिय्यात के बाद दरूद शरीफ़ भी पढ़ना चाहिये, और तीसरी रकाअत के लिये खड़ा हो तो तीसरी रकाअत के सुरु में सना ( सुबहानकल्लाहुम्मा ) पूरी पढ़े और तअव्वुज़ ( अउजोबिल्लाह ) भी पूरा पढ़े, क्योंकि सुन्नते गैर मोअक़ैदा मिस्ले नफल यानी नफल कि तरह है, और नफल नमाज़ का हर का’दा मिस्ले का’दा ए आखिरा है, लिहाज़ा हर का’दा में अतहिय्यात और दरूद शरीफ पढ़ना चाहिये, और पहले का’दा के बाद वाली रकाअत यानी तीसरी रकाअत के शुरू में सना और तअव्वुज़ भी पढ़ना चाहिये और हर रकाअत में सुर ए फातेहा के बाद सूरत भी मिलना चाहिये,

( दुरे मुख्तार,बहारे)
( शरीअत हिस्सा न 4 सफहा न 15 )
(फतावा रजवीया जिल्द न 3 सफहा न 469,) (मोमीन की नमाज पेज 188 )

ईशा के नमाज के तलूक से मसाइल

( 8 ) 【मस’अला】! ईशा की नमाज़ में आखिरी दो ( 2 ) रकाअत नफल नमाज़ खड़े होकर पढना अफजल और दूना सवाब है, और बैठकर पढमे में भी कोई ए’तराज नही

( 9 )【मस’अला】! नमाज़े वीत्र की तीन ( 3 ) रकाअत है और उस मे का’द ए उला वाजिब है का’द ए उला में सिर्फ अतहिय्यात पढ़कर खड़ा हो जाना चाहिये अगर का’द ए उला में नही बैठा और भूल कर खड़ा हो गया तो लौटने की इजाज़त नही, बलिक सज़द ए सहव करे ( मोमीन की नमाज़ पेज 198 )

! जियादह जान नेके लिए आप मोमीन की नमाज़ का मुताला करे

ईशा के नमाज़ के तलूक से मसाइल

(10 ) 【मस’अला】वीत्र नमाज़ की तीनों रकाअतो में किरअत फ़र्ज़ है और हर रकाअत में सूरे ए फातेहा के बाद सूरत मिलाना वाजिब है ( बहारे शरीअत हिस्सा न 4 सफहा न 4 )

( 11 ) 【 मस’अला】वीत्र की तीसरी रकाअत में कीरअत के बाद और रुकूअ से पहले कानो तक हाथ उठाकर ,अल्लाहु अकबर कहकर हाथ बाध लेना चाहिये और दुआ ए क़ुनूत पढ़ कर रुकूअ करना चाहिये

( 12 ) 【 मस’अला】वित्र में दुआ ए क़ुनूत पढ़ना वाजिब है, अगर दुआ ए क़ुनूत पढ़ना भूल गया और रुकूअ में चला गया तो अब रुकूअ से वापस न लौटे बलिक नमाज़ पूरी करे और सज़दे ए सहव करे ( आलमगीरी फतावा रजविया जिल्द न 3 सफहा न 645 )

( 45 )【मस’अला】अमले क़लील करने से नमाज़ फ़ासिद न होगी, अमले क़लील से मुराद येह है कि ऐसा कोई काम करना जो आमाले नमाज़ से या नमाज़ की इस्लाह के लिये न हो और उस काम के करनेवाले नमाज़ी को देखकर देखनेवाले को गुमान गालिब न हो कि येह आदमी नमाज़ में नही बलिक शक व शुब्ह आशंका हो कि नमाज़ में हैं या नही ? तो ऐसा काम अमले क़लील है {दुरे मुख़्तार}

( 45 )【मस’अला】नमाज़ में अमले कसीर करना मुफसिदे नमाज़ है, अमले कसीर से मुराद येह है कि ऐसा कोई काम करना जो आमाले नमाज़ ( नमाज़ के कामो ) से न हो और न ही वोह अमल नमाज़ की इस्लाह के लिये हो, अमले कसीर की मुख्तसर और जामेअ तारीफ़( सक्षप्त तथा सुस्पषट comprehensive व्याख्या ) येह है कि ऐसा अमल करना कि उस काम को करने वाले नमाज़ी को दूर से देखकर देखने वाले को गालिब गुमान हो कि येह शख्स नमाज़ में नही तो वोह काम अमले कसीर है, { दुरे मुख्तार बहारे शरीअत हिस्सा न 3 सफहा न्न 153 }

【नोट】 बाज़ लोग हालते नमाज़ में कौमा में सज़दा मे जाते वक़्त दोनो हाथो से पाजामा उपर की तरफ खीचते है या का’दा में बैठते वक़्त कुताँ या कमीज़ शर्ट का दामन सीधा करके गोंद में बिछाते है,इस हरकत ( आचरण ) से नमाज़ फ़ासिद हो जाने का अंदेशा है, कियुकि येह काम दोनो हाथो से किया जाता है,और इसका अमले कसीर में शुमार होने का इम्कान ( possibility ) है लिहाजा इस चेषता से बचना लाज़मी और जरूरी है कियोंकि इससे नमाज़ मकरुंहे तहरीमी तो जरूर होती है और जो नमाज़ मकरुहे तहरीमी हो उस नमाज़ का ए आदा लाज़मी है , ( माखुज borrowed ) अज़ : {फतावा रजविया जिल्द न 3 सफहा न 416}

( 48 )【मस’अला】नमाज़ में आस्तीन उपर को इस तहर चढाना कि हाथो की कोहनी ( कोणी ) खुल जाए नमाज़ मकरुहे तहरीमी वाज़ेबुल ए आदा होंगी, अगर फिर से दोबारा नही पढ़ी तो गुनाहगार होगा { फत्हुल क़दीर बहरुर राइक़ फतावा रजविया जिल्द न 3 सफहा न 416/ 423 }

( 49 )【मस’अला】आधी ( 1/2 ) कलाई से ज़यादा आस्तीन ( बाय ,Sleeve ) चढ़ाना भी मकरुहे तहरीमी है ख्वाह पहले से चढ़ी हुई हो या हालते नमाज़ में चढ़ाई हो { दुरे मुख्तार बहारे शरीअत हिस्सा न 3 सफहा न 166 )

( 50 )【मस’अला】बदन पर इस तरह कपड़ा लपेट कर नमाज़ पढ़ना कि हाथ भी बहार न हो मकरूहे तहरीमी है, {बहारे शरीअत हिस्सा 3 सफहा न 140 }

दोस्तो ऐसे मसाइल खूब सेर करते जाए किया पता किस की नमाज़ सही हो जाय और उसका सवाब आप को मिले,

( 51 ) 【मस’अला】धोबी को कपड़े धोने को दिये और धोबी कपड़े बदल कर लाया यानी किसी और (अन्य/ दूसरे) के कपड़े ले आया तो उन कपड़ो का पहनना मर्द औरत सब को हराम है , और अगर उन कपड़ो को पहन कर नमाज़ पढ़ी तो नमाज़ मकरुहे तहरीमी वाज़ेबुल ए आदा होगी,
{ फतावा रज़वीया जिल्द न 3 सफहा न 417 मोमीन की नमाज़ पेज 272}

( 52 )【मस’अला】जिस कपड़े पर जानदार ( जीवन ) की तस्वीर बनी हो, उसे पहनकर नमाज़ पढ़ना मकरुहे तहरीमी है, नमाज़ के इलावा भी ऐसे कपड़े पहनना जाइज़ नही, इसी तहर नमाज़ी के सर पर या नी छत ( roof ) में या नमाजी के आगे पीछे या दाये बाये किसी जानदार की तस्वीर नस्ब ( जड़ी fixture ) या मुअल्लक ( लटकती Hanging ) या मुनक़्क़हे ( painted/Embroided ) है, तो भी नमाज़ मकरुहे तहरीमी होगी,{ बहारे शरीअत हिस्सा 3 सफहा न 168 फतावा रज़वीय जिल्द न 3 सफहा न 448 )

( 53 )【मस’अला】तस्वीर वाला कपड़ा पहने हुए है और उस पर दूसरा कपड़ा पहन लिया कि तस्वीर छुप ( अद्रशय Disappear ) गई तो अब नमाज़ मकरुह न होगी {बहारे शरीअत हिस्सा 3 सफहा न 161 }

इन्शा अल्लाह पोस्ट जारी रहे गा

( 54 )【मस’अला】अगर ऐनक ( चश्मा Spectacle) का हल्का (Ring) और किमे ( डंडीया ) सोने या चांदी की है तो ऐसी ऐनक ना जाइज़ है, ऐंसी ऐनक को पहनकर नमाज़ पढना सख्त मकरुहे है, और अगर ऐनक का हल्का या कीमे तांबे या अन्य धात ( Metal ) की हो तो बेहतर येह है कि नमाज़ पढ़ने वक़्त उस ऐनक को उतार दे वर्ना नमाज़ खिलाफ अवला और किराहत से खाली नही,{ फतावा रजविया जिल्द न 3 सफहा 427}

( 55 )【मस’अला】मुक़्तदी जमाअत में शामिल होने की जल्दी में सफ के पीछे ही, अल्लाहो अकबर ( तक़बीरे तहरीमा ) कहे कर सफ में दाखिल हुआ तो उसकी नमाज़ मकरुहे तहरीमी हुई {आलमगीरी बहारे शरीअत हिस्सा 3 न 170 }

( 56 )【मस’अला】मर्द का सज़दे में हाथकी कलाईया ज़मीन पर बिछाना मकरुहे तहरीमी है {मोमीन की नमाज़}

इन्शा अल्लाह पोस्ट जारी रहे गा

दोस्तो ऐसे मसाइल खूब सेर करते जाए किया पता किस की नमाज़ सही हो जाय और उसका सवाब आप को मिले

( 60 )【मस’अला】फ़र्ज़ वीत्र इदैन और फ़र्ज़ की सुन्नत इन तमाम नमाज़ों में क़याम फ़र्ज़ है, अगर बिला उज़्र सहीह येह नमाजे बेठकर पढ़गा तो नमाज़ न होगी {दुरे मुख्तार]

( 61 )【मस’अला】एक पाव पर खड़ा होना यानी दुसरे पाव ( Leg ) को ज़मीन से उठा हुआ रखकर क़याम करना मकरुहे तहरीमी है अगर किसी उज़्र मजबूरी की वजह से ऐसा किया तो हर्ज़ नही, {आलमगीरी}

( 62 )【मस’अला】अगर कुछ दैर के लिये भी खड़ा हो सकता है, अगरचे इतना ही की खड़ा होकर अल्लाहु अकबर कह ले तो फर्ज है कि खड़ा होकर इतना ही कह ले फिर बैठ जाए,{फ़तवा रजविया जिल्द न 3 सफहा न 52}

दोस्तो ऐसे मसाइल खूब सेर करते जाए किया पता किस की नमाज़ सही हो जाय और उसका सवाब आप को मिले,

[सर्फ के मुतअल्लिक जरूरी मसाइल]

( 63 )【मस’अला】मर्द की पहली सर्फ (लाईन क़तार Row) की जो इमाम के करीब है, वोह दुसरी सर्फ़ से अफजल है और दुसरी सर्फ तीसरी सर्फ से अफजल है, व अला हाज़ल क़यास, { आलमगीरी बहारे शरीअत हिस्सा 3 सफहा 132 }

( 64 )【मस’अला】मुक़द्दम ( प्रेथम prior ) सर्फ का अफजल होना गैर नमाज़ ज़नाज़ा में है,और नमाजे ज़नाज़ा में आखिरी सर्फ अफजल है,{ दुरे मुख्तार }

( 65 ) 【मस’अला】किसी भी सफ में फर्जी खाली जगह रखना मकरुहे तहरीमी है, जब तक अगली सफ पूरी न करले दुसरी सफ हरगिज़ न बाधे,{ फतावा रजविया जिल्द न 3 सफहा न 318 }

( 66 )【मस’अला】अगर पहली सफ में जगह खाली है और लोगों ने पिछली सफ बांध कर नमाज़ शुरू करदी है, तो पिछली सफ चीरकर भी अगली सफ में जाने की इजाजत है, लिहाज़ा उस पिछली सफ को चीरता हूआ जाए और अगली सफ की खाली जगह में खड़ा हो जाए ऐसा करने के लिये हदीस में आया है
की जो शख्स सफ में कुशादगी देखकर उसे बन्द कर दे उसकी मग़फेरत हो जाएगी,{ आलमगीरी बहारे शरीअत हिस्सा 3 सफहा 133 }

दोस्तो ऐसे मसाइल खूब सेर करते जाए किया पता किस की नमाज़ सही हो जाय और उसका सवाब आप को मिले,

नमाज़ हर मुसलमान मर्द औरत पर फ़र्ज़ है

( 67 )【मस’अला】अगर किसी सफ में आठ ( 8 ) नौ ( 9 ) बरस का या कोई नाबालिग ( कम उम्र का ( tender Age ) लड़का तन्हा खड़ा हो गया है, यानी मर्दो ( पुख्ता उम्रर के Adult ) की सफ के बीच मे एक ना बालिग लड़का खड़ा हो गया है, तो उसे हालते नमाज़ में हटा कर दूर नही कर सकते आज कल अकसर मस्जिदों में देखा गया है कि अगर मर्दो की सफ में कोई एक नाबालिग लड़का खड़ा हो गया है तो उसे एन नमाज़ की हालत में पीछे की सफ में धकेल देते है और उसकी जगह खुद खड़े हो जाते है, येह सख्त मना है फतावा रजविया में है कि

समजदार लड़का आठ नौ बरस का जो नमाज़ खूब जानता है अगर, तन्हा होतो उसे सफ से दूर यानी बीच मे फासला छोड़कर खड़ा करना मना है

फ इन्नस्सलातस – सबिय्यील – मुमय्येज़िल – लज़ी – यअ़क़लुस- सलाता – सहीहतन – क़तअ़न-व क़द – अमरन – नबिय्यो – सल्लल्लाहो – तअला – अलैहे – वसल्लमा – बे सद्दिल – फर्ज – वल – तरासे – फील – सुफुफे – व – नहा – अन – ख़िलाफेही – बे – नहयिश – शदीदे,

और येह भी कोई ज़रूरी उम्र नही की वोह सफ में बायें ही हाथ खड़ा हो, ओलोमा उसे सफ में आने और मर्दो के दरमियान खड़ा होने की साफ इजाज़त देते है, दुरे मुख्तार में है कि

लव – वाहिदन – दख़लस – सफ़का – मराकीयूल फलाह में है, कि इल लम – य कु न – ज म अ़। – मि न स – सि ब या ने – य कु मु स्स बि य्यो – बयनररिजाले बा ज़ बे इल्म जो यह ज़ुल्म करते है कि लड़का पहले से दाख़िले – नमाज़ है अब येह आए तो उसे निय्यत बांधा हुआ हटा कर किनारे एक साइड कर देते है और खुद बीच मे खड़े हो जाते है येह महज़ सपूण ( स्वरूप-Entirely ) जिहालत है इसी तहर येह खयाल मान्यता भी गलत और खता है कि लड़का बराबरा पास में खड़ा हो तो मर्द की नमाज़ नही होती, इस मान्यता की भी कोई अस्ल हकीक़त नही,

( फतावा रजविया जिल्द न 3 सफहा न 318 और 381 मोमीन की नमाज़ पेज 320 )

नोट: येह मसअला उस सूरत ( परिसिथ्ति circumstances ) में है कि मर्दो की सफ में नाबालिग लड़का आ गया हो लैकिन पहले से सफो को तरतीब। देते वक़्त मर्दो की सफे मुकद्दम आगे रखे और बच्चों की सफे मर्दो की सफो के पीछे रखे कि सफो कि तरतीब (व्यवस्था Arrangement) देते वक़्त मर्दो और बच्चों को एक सफ में खड़ा नही होना चाहिये

दोस्तो ऐसे मसाइल खूब सेर करते जाए किया पता किस की नमाज़ सही हो जाय और उसका सवाब आप को मिले,

नमाज़ हर मुसलमान मर्द औरत पर फ़र्ज़ है

( 68 )【मस’अला】दूसरी सफ में कोई शख्स निय्यत बाध चुका है और नमाज़ की निय्यत बांधने के बाद उसे पहली सफ में खाली जगह नज़र आईं तो इजाजत है कि ऐन नमाज़ की हालत में चले और जाकर खाली जगह भर दे, येह थोड़ा चलना शरीअत का हुक्म मानने और शरीअत के हुक्म की बजा आवरी अमल करने के लिये वाकेअ ( Occuring ) हुआ है, एक सफकी मिक़दार ( मात्रा ) तक चल कर सफ की खाली जगह पुर करने भरने की शरीअत में इजाजत है, अलबत्ता अगर दो ( 2 ) सफ के फासले ( अंतर Distance ) पर किसी सफ में जगह खाली है तो नमाज़ की हालत में चलकर उसे बन्द करने भरने न जाए क्योंकि येह चलना मशी ए कसीर ( ज़ियादा चलना more Walking ) हो जाएगा और हालते नमाज़ में दो ( 2 ) सफ के फासले जीतना चलना मना है

{ हुल्या शरहे मुन्या, रदुदुल मोहतार फतावा रजविया जिल्द न 3 सफहा न 316 मोमीन की नमाज़ 318 }

नमाज़ का पांचवा फर्ज : सजदा ‘ यानी ( 1 ) पेशानी ( 2 ) नाक ( 3/4 ) दोनो हाथो की हथेलिया ( 5/6 ) दोनो घुटने और (7/8 ) दोनो पाव की उंगलिया कुल आठ आज़ा ए जिस्म ( अवयव ) ज़मीन से लगना

”पेशानी का ज़मीन पर जमना लगाना सज़दा की हक़ीक़त है

[ हदीश ] ! इमामे मुस्लिम ने हज़रत अबु हुरैरा रदीय्यल्लाहु तआला अन्हु से रिवायत की हुज़ूर अकदस सल्लल्लाहू तआला अलैहि वसल्लम इरशाद फरमाते है कि बन्दे को खुदा से सब से जियादा क़ुर्ब नज़दीक हालाते सज़दा में हासिल होती है

खुदा ए तआला के सिवा किसी को सज़दा करना जायज़ नही गैर खुदा को इबादत का सज़दा करना सिर्क है कौर ता जीम का सज़दा करना हराम है

( 69 )【 मस’अला’ 】 पाव की एक उंगली का पेट जमीन से लगना शर्त फर्ज है। अगर किसी ने इस तहर सज़दा किया कि दोनों पाव जमीन से उठे रहे तो नमाज़ न होगी बलकी अगर सिर्फ उंगलियों की नोक अनी जमीन से लगी तो भी नमाज न हुए

{फतवा रजविया जिल्द न 1 सफ़हा 553,?}
【 मोमीन की नमाज़ पेज 112 】

( 70 ) 【 मस अला 】मर्द के लिये सुन्नत है सजदा में बाजू को करवटो से जुदा रखे और पेट रानो से जुदा रखे इलावा अज़ी सज़दा में कलाइया जमीन पर न बिछाई बलिक हाथेलियोको जमीन पर रखकर कोहनिया ऊपर उठाए रखे ( दुरे मुख्तार आलमगीरी बहारे शरीयत )

( 71 ) 【मस ‘अला】 औरत के लिये सुन्नत येह है कि वोह सिमट कर सजदा करे यानी बाज़ू को करवट से पेट को रान से रान को पिडलियो से और पिडलिया जमीन से मिला दे कोहनियां और कलाईया जमीन पर बिछादे ( आलामगिरी )

दोस्तो ऐसे मसाइल खूब सेर करते जाए किया पता किस की नमाज़ सही हो जाय और उसका सवाब आप को मिले,

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