Namaz ke Zaroori Masail – Ahkam e Namaz – Page 3

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तमाम किस्म के मुक़्तदीयो के लिये जरूरी मसाइल

( 89 )【मस’अला】मुक़्तदी ने इमाम से पहले रुकूअ या सज़दा किया मगर उसके सर उठाने से पहले ही इमाम रुकूअ या सज़दा में पहुंच गया तो मुक़्तदी का रुकूअ या सज़दा हो गया लैकिन मुक़्तदी को ऐसा करना हराम है { आलमगीरी बहारे शरीअत हिस्सा 3 सफहा 140 }

( 90 )【मस’अला】किसी मुक़्तदीने इमाम से पहले कोई फै’ल ( चेष्टा Motion ) इस तरह किया कि इमाम भी उस फेल में आ मिला मस्लन मुक़्तदी ने इमाम के रुकूअ करने से पहले रुकूअ कर दिया लैकिन मुक़्तदी अभी रुकूअ ही में था कि इमाम भी रुकूअ में आ गया और दोनों की रुकूअ में शिरकत साथ हो गई येह सूरत अगरचे सख़्त ना जाइज़ और ममनुअ है और हदिस शरीफ में इस पर शदीद वईद वारिद ( शिक्षा की धमकी का वणर्न ) है मगर इस सूरत में यू भी नमाज़ हो जाएगी जबकि मुक़्तदी और इमाम की रुकूअ में मुशारेकत ( साथ होना Partaken ) हो जाए,

और अगर इमाम अभी रुकूअ में न आने पाया था और मुक़्तदी ने रुकूअ से सर उठा लिया और फिर मुक़्तदी ने इमाम के साथ या बाद में इस फैल काए’आदा( पनरावतन-Reletition ) न किया तो मुक़्तदी की नमाज़ अस्लन न हुई कि अब फर्ज मुताबेअत ( ताबेदारी obsequiousness ) की कोई सूरत न पाई गई लिहाजा फर्ज तर्क हुआ ( छुटा ) और नमाज़ बातिल नष्ट हो गई
{ रदूदुल मोहतार, फतावा रजविया जिल्द 3 सफहा 408 मोमीन की नमाज़ पेज 359 }

( 91 )【मस’अला】रुकूअ या सज़दे में मुक़्तदी ने इमाम से पहले सर उठा लिया और इमाम अभी रुकूअ या सज़दे में है तो मुक़्तदी पर वापस लोटना वाजिब है और वापस लौटने की वजह से येह दो ( 2 ) रुकूअ या दो ( 2 ) सज़दे शुमार ( गिनती ,count ) नही होगे,{ आलमगीरी बहारे शरीअत हिस्सा 3 सफहा 139 }

दोस्तो ऐसे मसाइल खूब सेर करते जाए किया पता किस की नमाज़ सही हो जाय और उसका सवाब आप को मिले,

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( 92 )【मस’अला】चार ( 4 ) काम वोह है कि अगर इमाम उसे करे तो भी मुक़्तदी उसे न करे और इमाम का साथ न दे ( 1 ) नमाज़ में कोई जाइद ( ज़ियादा-Extra ) सज़दा किया ( 2 ) ईदैन की नमाज़ में छे ( 6 ) से जियादा तक़बीर ( तक़बिराते ईदैन ) कही ( 3 ) नमाजे जनाजा में पाच ( 5 ) तक़बीरे कही ( 4 ) का’द-ए आखिरा करने के बाद इमाम जाइद रकअत के लिये खड़ा हो गया तो मुक़्तदी इमाम के साथ खड़ा न हो बल्कि इमाम के वापस लौटने का इन्तजार करे, अगर इमाम पाचवी ( 5 ) रकअत के सज़दे से पहले लौट आए, तो मुक़्तदी इमाम का साथ दे और इमाम के साथ ही सलाम फेरे और इमाम के साथ ही सज़द ए सहव भी करे

और अगर इमाम ने पाचवी रकअत का सज़दा कर लिया और क़ा’दा में नही लौटा तो मुक़्तदी तन्हा ( अकैले ) सलाम फैर कर अपनी नमाज़ पूरी करले और अगर इमाम ने का’दा ए आखिरा ही नही किया था और पाचवी रकअत का सज़दा कर लिया तो सबकी नमाज़ फ़ासिद हो गई अगरचे मुक़्तदी ने अतहिय्यात पढ़ कर सलाम फैर लिया हो { आलमगीरी बहारे शरीअत हिस्सा 3 सफहा 140}

( 93 )【मस’अला】पाच ( 5 ) काम वोह है कि अगर इमाम उसे न करे और छोड़ दे तो मुक़्तदी भी उसे न करे और इमाम का साथ दे ( 1 ) तक़बिराते ईदैन यानी दोनो ईद की नमाज़ में जाईद ( विशेष Extra ) तक़बीरे दी जाती है ( 2 ) का’द ए उला यानी दो ( 2 ) से जियादा रकअत वाली नमाज़ का पहला का’दा ( 3 ) सजद ए तिलावत ( 4 ) सजद ए सहव ( 5 ) दुआ ए क़ुनूत जबकि रुकूअ फौत होने का अंदेशा हो वर्ना क़ुनूत पढ़ कर रुकूअ करे { आलमगीरी सगीरी, बहारे शरीअत हिस्सा 3 सफहा 139 }

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( 94 )【मस’अला】 का’द-ए उला में इमाम तशहहूद अतहिय्यात जल्दी पढकर तीसरी रकअत के लिये खड़ा हो गया और बा’ज़ कुछ मुक़्तदी तशहहूद पढ़ना भूल गए और इमाम के साथ खड़े हो गए, तो जिसने तशहहूद नही पढा था वोह बैठ जाए और तशहहूद पढकर इमाम की मुताबेअत करे अगरचे वापस बैठकर तशहहूद पढ़ने की वजह से रकअत फौत छूट जाए हो जाए, { आलमगीरी बहारे स शरीअत हिस्सा 3 सफहा 139 }

दोस्तो ऐसे मसाइल खूब सेर करते जाए किया पता किस की नमाज़ सही हो जाय और उसका सवाब आप को मिले,

95 )【मस’अला】हुक़्क़ा बीड़ी सिगरेट या तम्बाकु खाने पीने वाले के मुंह मे बदबू ( दुग्ध Foul Smell ) होने की हालत में नमाज़ मकरुहे है और ऐसी हालत में मस्जिद में जाना भी मना है जब तक मुह साफ न कर ले { फतावा रजविया जिल्द न 3 सफहा न 446 }

( 96 )【मस’अला】नमाज़ी के लिये मुस्तहब है कि हालते क़याम में अपनी नज़र सज़दा करने की जगह पर रखें {बहारे शरीअत}

( 97 )【मस’अला】क़याम में तरावोह बयनल क़दमैन या नी थोड़ी दैर एक पाव पर ज़ोर वजन रखना फिर थोड़ी दैर दूसरे पाव पर ज़ोर रखना सुन्नत है {फतावा रजविया जिल्द न 3 सफहा न 449 }

दोस्तो ऐसे मसाइल खूब सेर करते जाए किया पता किस की नमाज़ सही हो जाय और उसका सवाब आप को मिले,

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[ जमाअत से नमाज़ पढ़ने का ब्यान ]

▪हुज़ूरे-अकदस सल्लल्लाहो तअला अलैहे वसल्लमने हमेशा जमाअत के साथ नमाज़ पढ़ी है और अपने सहाबा रदियल्लाहो तअला अन्हुम को भी हमेशा नमाज़ बा-जमाअत पढ़ने की ताकीद बार बार सूचना फरमाई है

▪ हदीस शरीफ में है कि जमाअत के साथ नमाज़ पढ़ना तन्हा अकैले नमाज़ पढ़ने सेजमाअत के साथ नमाज़ पढ़ने की फजीलत और जमाअत को छोड़ने की वईद में अनेक हदीसे रिवायट की गई है जिन मेसे चन्द हदीस खिदमत है सत्ताईस ( 27 ) दर्जा ज़ियादा फजीलत रखता है, { तफसीर खजाईनुल इरफान सफहा न 13 }

▪ जमाअत से नमाज़ पढ़ना इस्लाम की बड़ी निशानियों मेसे है जो किसी भी दिन धर्म मे न थी

▪ जमाअत के साथ नमाज़ पढ़ने की फजीलत और जमाअत को छोड़ने की वईद में अनेक हदीसे रिवायट की गई है जिन मेसे चन्द हदीस खिदमत है

( 98 )【 हदीस 】इमाम तिरमिजी हजरत अनस रादिय्यल्लाहो तअला अन्हो से रावी कि हुज़ूरे अक़दस सल्लल्लाहो तआला अलैहे वसल्लम इरशाद फरमाते है कि जो अल्लाह के लिये चालीस ( 40 ) दिन बा-जमाअत नमाज़ पढे और तक़बीरे उला पाए, उसके लिये दो ( 2 ) आज़ादिया है एक नार ( जहन्नम की आग ) से और दुसरी निफ़ाक़ ( पाखंड-Hypocrisy ) से

( 99 )【 हदीस 】सहीह मुस्लिम शरीफ में हजरत उस्मान रदीय्यल्लाहो तअला अन्हो से मर्वी है कि हुज़ूरे अक़दस सल्लल्लाहो तअला अलैहे वसल्लम इरशाद फरमाते है कि जिसने बा-जमाअत इशा की नमाज़ पढ़ी गोया उसने आधी रात क़याम किया यानी इबादत की नमाज़ पढ़ी और जिसने फज़्र की नमाज़ जमाअत से पढ़ी गोया उसने पूरी रात इबादत की

( 100 )【हदीस】इमाम बुखारी और इमाम मुस्लिम ने हज़रत अबू हुरैरह रदिय्यल्लाहो तअला अन्हो से रिवायत की कि हुज़ूरे अक़दस सल्लल्लाहो तअला अलैहे वसल्लम इरशाद फरमाते है कि मुनाफिको पर सबसे जियादा गिरा ( भारी/कष्ट दायक Burdensome ) नमाजे इशा और फज़्र है अगर वोह जानते कि इस मे क्या सवाब है ? तो घसीटते हुए आते और बेशक मैंने क़स्द इरादा किया कि नमाज़ क़ायम करने का हुकुम दु फिर किसी को हुकुम दु की लोगो को नमाज़ पठाए और मैं अपने हमराह साथ मे चंद लोगो को जिन के पास लकड़ियों ( wool ) के गटठे हो उन के पास ले जाऊ जो नमाज़ में हाज़िर नही होते और उनके घरों को जला दु

( 101 )【हदीस 】इमाम बुखारी इमाम मुस्लिम इमाम तिरमिजी, इमाम मालिक और इमाम नसाई हजरत अब्दुल्लाह इब्ने उमर रदिय्यल्लाहो तआला अन्हो से रावी की हुज़ूरे अक़दस सल्लल्लाहो तअला अलैहे वसल्लम इरशाद फरमाते है कि जमाअत से नमाज़ पढना तन्हा ( अकेले , Alone ) नमाज़ पढ़ने से सताईस ( 27 ) दर्जा बढ़कर है

( 102 )【हदीस】अबु दावूद ने हज़रत अब्दुल्ला इब्ने मसउद रदिय्यल्लाहो तअला अन्हो से रिवायत की कि हुज़ूरे अक़दस सल्लल्लाहो तअला अलैहे वसल्लम इरशाद फरमाते है कि जो शख्स अच्छी तरह तहारत करे मस्जिद को जाए तो जो क़दम चलता है हर कदम के बदले अल्लाह तअला नैकी लिखता है और दर्ज़ा बुलन्द करता है और गुनाह मिटा देता है

( 103 )【हदीस】 नसाई और इब्ने खुजयमा अपनी सहीह में हज़रत उस्मान गनी रादिय्यल्लाहो तआला अन्हो से रिवायात करते है कि हुज़ूरे अक़दस सल्लल्लाहो तअला अलैहे वसल्लम इरशाद फरमाते है जिसने कामिल सम्पूर्ण वुजु किया फिर फर्ज नमाज़ के लिये मस्जिद की तरफ चला और इमाम के साथ फर्ज नमाज़ पढ़ी उस के गुनाह बख्श दिये जाते है { मोमीन की नमाज़ पेज 305 }

( 104 )【मस’अला】पाचो वक़्त की नमाज़ मस्जिद में जमाअत के साथ वाज़िब है एक वक़्त का भी बिला उज़्र तर्क गुनाह है { फतावा रजविया जिल्द न 3 सफहा न्न 372}

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( 105 )【मस’अला】क़याम की हालत में दोनों पाव के दरमियान चार ( 4 ) उंगल का फासला अंतर रखना सुन्नत है और यही हमारे इमामे आ’ज़म से मन्कुल है। { फतावा रजविया जिल्द 3 सफहा 51 }

( 106 )【मस’अला】 जिन नमज़ो में क़याम खड़ा होना फर्ज है उनमें तक़बीरे तहरीमा के लिये भी कयाम फर्ज है अगर किसी ने बैठकर अल्लाहो अकबर कहा फिर खड़ा हो गया तो उसकी नमज़ शुरू ही न हुई {दुरे मुख्तार आलमगीरी}

( 107 )【मस’अला】तक़बीरे तहरीमा में हाथ उठाते वक़्त उंगलियों को अपने हाल पर छोड देना चाहिये यानी उंगलियो को बिल्कुल मिलाना भी न चाहिये और ब:तकल्लुफ ( तकलीफ उठाकर inconvenient ) कुशादा ( खुली opened ) भी न रखना चाहिये और येह सुन्नत तरीका है { बहारे शरीअत }

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जमाअत के मूत अल्लिक़ जरुरी मसाइल

( 108 )【मस’अला 】हर आकिल, बालिग, आजाद, और क़ादिर मर्द पर जमाअत से नमाज़ पढना वाजिब है बिला उज्र एक मरतबा भी छोडनेवाला गुनाहगार और मुस्तहिक़्के सज़ा है, और कई अनेक मरतबा तर्क करे तो फासिक और मरदुदुशशहादत, है यानी उसकी गवाही कबुल नही की जाएगी और उस को सख्त सज़ा दी जाएगी अगर उसके पड़ो सियो ( neighbour ) ने सुकुट किया यानी उसकी जमाअत को छोड़ने की आदत पर चप रहे तो वोह भी गुनाहगार हुए { दुरे मुख्तार, बहारे शरीअत हिस्सा न 3 सफहा न 129 }

( 109 )【मस’अला】जुम्मा और ईदैन दोनो ईद की नमाज़ में जमाअत शर्त है तरावीह में जमाअत करना सुन्नते किफाया है नवाफिल और रमजान के इलावा वित्र में अगर तदाई ( ऐलान Announce ) के तौर पर जमाअत की जाए तो मकरुह है तदाई के माना येह है कि जमाअत करने का एलान हो और तीन ( 3 ) से ज़ियादा मुक़्तड़ी हो { दुरे मुख्तार रदुदुल मोहतार आलमगीरी }

( 110 )【मस’अल】सूरज गहेन ( ग्रहण ) की नमाज़ में जमाअत सुन्नत है और चांद गहन की नामज़
तदाई ( एलान ) के साथ जमाअत से मकरुहे है { बहारे शरीअत हिस्सा 3 सफहा 130 }

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( 111 )【मस’अला】एक इमाम और एक मुक़्तदी यानी दो ( 2 ) आदमी से भी जमाअत क़ायम हो सकती है और एक से जियादा मुक़्तदी होने से जमाअत की फजीलत जियादा है मुक़्तदीयो की ता’दाद ( सख्या ) जितनी ज़ियादा होगी उतनी फजीलत जियादा होगी

( 112 ) 【हदीस】इमाम अहमद अबु दाऊद नसाई इब्ने खूजयमा और इब्ने हब्बान ने अपनी सहीह में हजरत उबई इब्ने का’ब रादिय्यल्लाहो त’आला अन्हो से रिवायात की कि हुज़ूरे अक़दस सल्लल्लाहो तअला अलैहे वसल्लम ने इरशाद फरमाया कि मर्द की एक मर्द के साथ नमाज़ तन्हा अकेले नमाज़ पढनेकी निस्बत जियादा पाकीज़ा है और दो ( 2 ) के साथ ब निस्बत एक के जियादा अच्छी है और जितने ज़ियादा हो अल्लाह त’अला के नज़दीक जियादा महबूब है

( 113 )【मस’अला】जुमआ और ईदैन यानी ईदुल फित्र और ईदुल अज़हा की नमाज़ की जमाअत के लिये कम से कम तीन ( 3 ) मुक़्तदी का होना शर्त है दीगर अन्य नमज़ो की तरह एक ( 1 ) या दो ( 2 ) मुक़्तदी से जूमआ और ईद की नमाज़ क़ायम नही हो सकती जूमआ और ईदैन की नमाज़ की जमाअत के लिये इमाम के इलावा कम से कम तीन मर्द मुक़्तदीयो का होना जरूरी है अगर तीन ( 3 ) मर्द से कम ( less ) मुक़्तदी होंगे तो जूमआ और इदैन की जमाअत सहीह नही, { फतावा रजविया जिल्द न 3 सफहा न 683 }

( 114 )【मस’अला】अकेला मुक़्तदी मर्द अगरचे लड़का हो वोह इमाम के बराबर दाहनी जानिब ( Right side ) खड़ा हो बाए या पिछे खडा होना मकरुह है और अगर दो ( 2 ) मुक़्तदी हो तो इमाम के पीछे खड़े हो दो ( 2 ) मुक़्तदीयो का इमाम के बराबर खड़ा होना मकरुहे तन्ज़ही है और ( 2 ) से जियादा मुक़्तदीयो का इमाम के करीब खड़ा होना मकरुहे तहरीमी है { दुरे मुख्तार जिल्द 1 सफहा न 381}

दोस्तो ऐसे मसाइल खूब सेर करते जाए किया पता किस की नमाज़ सही हो जाय और उसका सवाब आप को मिले,

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( 115 )【मस’अला】अगर इमाम और सिर्फ एक ( 1 ) मुक़्तदी जमाअत से नमाज़ पढ़ते हो और दूसरा मुक़्तदी आ गया तो अगर पहला मुक़्तदी मस’अला जानता है और उसे पीछे हटने की जगह है तो वोह पीछे हट जाए और दूसरा मुक़्तदी उस पीछे हटनेवाले मुक़्तदी के बराबर खड़ा हो जाए,
अगर पहला मुक़्तदी मस’अला नही जानता या मस’अला तो जानता है लैकिन पीछे हटने की जगह नही तो इमाम आगे बढ़ जाए और अगर इमाम को भी आगे बढ़ने की जगह नही तो दूसरा मुक़्तदी इमाम के बाऎ हाथ की जानिब ,( Left Side ) इमाम के करीब खड़ा हो जाए मगर अब तीसरा मुक़्तदी आकर इमाम के करीब दाये या बाये कही भी खड़ा होकर जमाअत में शामिल नही हो सकता वर्ना सब की नमाज़ मकरुहे तहरीमी होगी और इमाम तथा मुक़्तदीयो सबको उस नमाज़ का एआदा यानी दुबारा फिर से पढ़ना वाज़िब होगा। { फतावा रजविया जिल्द न 3 सफहा 260 }

( 116 )【मस’अला】अगर मज़क़ुरा ( वणनीय ) सूरत से दो ( 2 ) मुक़्तदी इमाम के करीब खड़े होकर नमाज़ पढ़ते हो और अब तीसरा मुक़्तदी आया और वोह जमाअत में शामिल होना चाहे तो उस पर लाजिम है कि पहले से शामिल होकर इमाम के करीब दाये, बाये खड़े दोनो मुक़्तदीयो में से किसी के भी करीब खड़ा न हो बल्कि इन दोनों के पीछे खड़ा हो जाए क्युकी इमाम के करीब तीन मुक़्तदीयो का खड़ा होना मकरुहे तहरीमी है

( 117 )【मस’अला】अगर एक ( 1 ) मुक़्तदी इमाम के बराबर करीब खड़ा होकर जमाअत से नमाज़ पढ़ रहा है और दूसरा मुक़्तदी जमाअत में शामिल होने आए तो मुक़्तदी पीछे हट आए और अगर दो मुक़्तदी इमाम के बराबर खड़े होकर जमाअत से नमाज़ पढ़ रहे हो और तीसरा मुक़्तदी जमाअत में शामिल होने आए तो इमाम को आगे बढ़ना अफजल है { बहारे शरीअत हिस्सा 3 सफहा 132 }

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जमाअत के मूतअल्लिक़ जरूरी मसाईल

( 118 )【मस’अला】इमाम के साथ सिर्फ एक ( 1 ) मुक़्तदी इमाम के बराबर खड़ा होकर जमाअत से नमाज़ पढ़ रहा है और दूसरा मुक़्तदी जमाअत में शामिल होने आया लैकिन वोह पहला मुक़्तदी पीछे नही हटता और न ही इमाम आगे बढ़ता है तो दूसरा मुक़्तदी पहले वाले मुक़्तदी को पीछे खींच ले और वोह बाद में आने वाला यानी दुसरा मुक़्तदी पहले मुक़्तदी को चाहे निय्यत बाधने से पहले खिंच ले चाहे तो निय्यत बाधने के बाद खिंचे दोनो सूरते जाइज़ है लैकिन निय्यत बाधने के बाद खीचना अवला ( उत्तम ) है। { फतावा रजविया जिल्द 3 सफहा 323 }

( 119 )【मस’अला】मुक़्तदी को पीछे खीचने की परिस्थति में वाजेबूत तम्बीह ( जरूरी चेतावनी Expedient instruct ) बात येह है कि खीचना उसी को चाहिये जो जी इल्मी हो या नी इस मस’अले से। वाकिफ हो अगर पहला मुक़्तदी कि जिसको खिंचा जा रहा है वोह अगर मसाइल से ना वाकिफ ( अन्जान ) है और उसको इस तरह खीचने का मस’अला ही नही मा’लूम तो अगर उसको पीछे खिंचा तो वोह पीछे खीचने पर बौखला जाएगा और क्या है और क्यों खिंचाते हो ? वगैराह कोई जुम्ला वाकई धबराहट की वजह से उसके मुंह से निकल जाएगा और मुबादा ( खुदा न करे ) किना वाकिफ की वजह से उसकी नमाज़ फ़ासिद हो जाए, लिहाज़ा खिंचे नही इलावा अज़ी एक अहम ( आवश्यक ) और जरूरी नुक़्ता भी याद रखना चाहिये कि नमाज़ में जिस तरह अल्लाह तबारक व तअला और रसूलल्लाह सल्लल्लाहो तआला अलैहे वसल्लम के सिवा किसी दूसरे से कलाम करना मुफसिदे नमाज़ है इसी तरह अल्लाह और रसूल के सिवा किसी का हुक्म मानना भी नमाज़ को फ़ासिद कर देता है ,

【लिहाज़ा】

अगर एक शख्स ने किसी नमाज़ी को पीछे खिंचा या इमाम को आगे बढ़ने को कहा और वोह नमाज़ी या इमाम कहने वाले का हुक्म मानकर अपनी जगह से आगे या पीछे हटा, तो उसकी नमाज़ जाती रही, अगरचे येह हुक्म देने वाला निय्यत बाध चुका हो और अगर हटने वाले ने कहने वाले के हुक्म का लिहाज न रखा और न उसके हुक़्म से कोई काम रखा बल्कि इस निय्यत से हटा कि शरीअत का हुक़्म है और शरीअत के मसअले के लिहाज से हरकत की तो नमाज़ में कुछ भी खलल ( भगाण ,interruption ) नही इस लिये बेहतर येह है कि हटने का हुक़्म देने वाले के कहते ही फौरन हरकत न करे यानी न हटे बल्कि थोड़ा सा तअम्मुल ( विलंब विचार Reflexion) करे और येह निय्यत कर के हरकत करे यानी हटे की इस कहने वाले के हुक्म से नही बल्कि शरीअत का हुक्म है इस लिये हट रहा हु ताकि ब: जाहिर गैर के हुक्म को मानने की सूरत ( परिस्थति ) न रहे

जब सिर्फ निय्यत का फर्क ( तफावुत ) होने से नमाज़ के फ़ासिद या दुरुस्त होने का मदार आधार है तो इस जमाने मे जबकि जमाने वालो पर जिहालत ( अझनता ) गालिब छाई हुई है और अजब तअज्जुब नही कि अवाम ( सामान्य जनता ) निय्यत के इस फर्क से अनजान होकर बिला वजह अपनी नमाज़े खराब कर ले लिहाजा दिन के इमामो ने फरमाया है कि गैर जी इल्म ( जाहिल ) को हरगिज न खिंचे और यहां जी इल्म से मुराद वोह है जो इस मसअले और निय्यत के फर्क से आगाह जानकार हो
{ बहारे शरीअत हिस्सा 3 सफहा 132 फतावा रजविया जिल्द 3 सफहा 323 और 399}

दोस्तो ऐसे मसाइल खूब सेर करते जाए किया पता किस की नमाज़ सही हो जाय और उसका सवाब आप को मिले,

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