Namaz ke Zaroori Masail - Ahkam e Namaz

Namaz ke Zaroori Masail – Ahkam e Namaz

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नमाज़ हर मुसलमान मर्द औरत पर फ़र्ज़ है

( 83 )【मस’अला】 ! मुक़तदी का’द ए उला में इमाम से पहले अतहिय्यात पढ चुका तो सुकूत करे (खामोश रहे) दरूद और दुआ कुछ न पढ़े (दुरे मुख्तार)

( 84 )【मस’अला 】! फ़र्ज़ वीत्र और सुन्नते मोअक्केदा के काद ए उला में अतहिय्यात के बाद इतना कह लिया कि अल्लाहुम्मा सल्ले अला मुहम्मदिन या अल्लाहुम्मा सल्ले अला सय्येदेना’ तो अगर सहवन भूलकर है तो सज़द ए सहव करे और अगर अमदन जान बुझकर है तो नमाज़ का ए आदा करे यानी फिर से पढ़े
( दुरे मुख्तार )
(फतवा रजवीया जिल्द न 3 सफह न 626) (मोमीन की नमाज़ 122)

( 85 )【मस’अला 】! उपर वाले मस’अले में जो हुक्म बयान किया गया है वोह इस वजस से नही की दरूद शरीफ पढ़ा बलिक इस वजस से है कि तीसरी रकअत का कयाम जो फ़र्ज़ है उसमें ताखीर ( विलम्ब ) हुई और फ़र्ज़ में ताखीर होने की वजह से सजद ए सहव लाज़िम होता है लिहाजा अगर किसी ने अतहिय्यात के बाद कुछ भी नही पढ़ा बलिक अल्लाहुम्मा सल्ले अला मुहम्मदिन पढने के वक़्त की मिक़दार तक चुप बैढा रहा तो भी सजद ए सहव वाजिब है

( रदुल मोहतार दुरे मुख्तार, बहारे शरीअत हिस्सा 4 सफहा न 53 फतावा रजविया जिल्द न 3 सफहा न 636 )

दोस्तो ऐसे मसाइल खूब सेर करते जाए किया पता किस की नमाज़ सही हो जाय और उसका सवाब आप को मिले,

इन्शा अल्लाह पोस्ट जारी रहे गा

नमाज़ हर मुसलमान मर्द औरत पर फ़र्ज़ है

तमाम किस्म के मुक़्तदीयो के लिये जरूरी मसाइल

( 86 )【मस’अला】इमाम रुकूअ में है और मुक़्तदी जमाअत में शामिल होना चाहता है तो सिर्फ तक़बीरे तहरीमा कहेकर रुकूअ में मिल सकता है, हाथ बाधने की अस्लन ( बिल्कुल ) हाज़त नही सिर्फ तक़बीरे तहरीमा कहकर रुकूअ में शामिल होने से सुन्नत यानी तक़बीरे रुकूअ फौत ( व्यय Loss ) होगी, लिहाज़ा चाहिये कि सीधा खड़े होने की हालत में तक़बीरे तहरीमा कहे और अगर सना पढ़ने की फुरसत ( Leisure ) न हो यानी येह एहतेमाल ( सभावना probability ) हो कि अगर सना पढता हु तो इमाम रुकूअ से सर उठा लेगा तो ऐसी सूरत ( परिस्थिति Circumstances ) में सना न पढे बल्कि तक़बीरे तहरीमा के साथ फौरन दूसरी तक़बीरे कहकर रुकूअ में चला जाए और अगर मुक़्तदी को इमाम की आदत मालूम है कि रुकूअ में दैर लगाता है और मैं सना पढ़कर भी रुकूअ में शामिल हो जाऊंगा तो सना पढ़कर रुकूअ की तक़बीर कहता हुआ शामिल हो येह सुन्नत है,

तक़बीरे तहरीमा खड़े होने की हालत में कहनी फर्ज़ है कुछ ना वाकिफ अनजान जो येह करते है कि इमाम रुकूअ में है और येह जनाब जुके हुए तक़बीरे तहरीमा कहते हुए शामिल हो गए अगर इतना झुका हुआ है कि तक़बीरे तहरीमा ख़त्म पूरी करने से पहले हाथ फैलाए लम्बा करे तो हाथ घूटने तक पहुंच जाए तो नमाज़ न होगी इस बात का ख्याल रखना तवज़्ज़ो देना लाज़िम है
{ फतावा रज़वीया जिल्द 3 सफहा 393 }

( 87 )【मस’अला】आजकल उमूमन सामान्यता येह बात देखी जाती है कि ज़रा सी कमजोरी या मामूली बिमारी या बुढ़ापा की वजह से सिरे से बैठकर फर्ज नमाज़ पढ़ते है, हालांकि उन बैठकर नमाज़ पढ़नेवालों मेसे बहुत से ऐसे भी होते है कि हिम्मत करे तो पुरी फ़र्ज़ नमाज़ खड़े होकर अदा कर सकते है और इस अदा से न इनका मरज़ बीमारी बढ़े न कोई नया मरज़ लाहिक लागू हो और न ही गिर पड़ने की हालत हो, बारहा का मुशाहेदा अनुभव है कि कमज़ोरी और बीमारी के बहाने बैठकर फ़र्ज़ नमाज़ पढ़ने वाले खड़े रहकर काफ़ी देर तक इधर उधर की बाते करते होते है ऐसे लोगो को बेठकर फर्ज नमाज़ पढ़ना जाइज़ नही बल्कि इन पर फर्ज है कि खड़े होकर नमाज़ अदा करे

{ फतावा रज़वीय जिल्द न 3 सफहा न 53 और 424 }

( 88 )【मस’अला】 अगर कोई शख़्स कमजोर या बीमार है लैकिन असा लकड़ी या खादिम या दीवाल पर टेक लगाकर खड़ा हो सकता है तो उस पर फर्ज़ है कि उन पर टेक लगा कर खड़ा होकर नमाज़ पढे {फतावा रज़वीय जिल्द 3 न 43 मोमीन की नमाज़ 86}

दोस्तो ऐसे मसाइल खूब सेर करते जाए किया पता किस की नमाज़ सही हो जाय और उसका सवाब आप को मिले,

इन्शा अल्लाह पोस्ट जारी रहे गा

नमाज़ हर मुसलमान मर्द औरत पर फर्ज है

तमाम किस्म के मुक़्तदीयो के लिये जरूरी मसाइल

( 89 )【मस’अला】मुक़्तदी ने इमाम से पहले रुकूअ या सज़दा किया मगर उसके सर उठाने से पहले ही इमाम रुकूअ या सज़दा में पहुंच गया तो मुक़्तदी का रुकूअ या सज़दा हो गया लैकिन मुक़्तदी को ऐसा करना हराम है { आलमगीरी बहारे शरीअत हिस्सा 3 सफहा 140 }

( 90 )【मस’अला】किसी मुक़्तदीने इमाम से पहले कोई फै’ल ( चेष्टा Motion ) इस तरह किया कि इमाम भी उस फेल में आ मिला मस्लन मुक़्तदी ने इमाम के रुकूअ करने से पहले रुकूअ कर दिया लैकिन मुक़्तदी अभी रुकूअ ही में था कि इमाम भी रुकूअ में आ गया और दोनों की रुकूअ में शिरकत साथ हो गई येह सूरत अगरचे सख़्त ना जाइज़ और ममनुअ है और हदिस शरीफ में इस पर शदीद वईद वारिद ( शिक्षा की धमकी का वणर्न ) है मगर इस सूरत में यू भी नमाज़ हो जाएगी जबकि मुक़्तदी और इमाम की रुकूअ में मुशारेकत ( साथ होना Partaken ) हो जाए,

और अगर इमाम अभी रुकूअ में न आने पाया था और मुक़्तदी ने रुकूअ से सर उठा लिया और फिर मुक़्तदी ने इमाम के साथ या बाद में इस फैल काए’आदा( पनरावतन-Reletition ) न किया तो मुक़्तदी की नमाज़ अस्लन न हुई कि अब फर्ज मुताबेअत ( ताबेदारी obsequiousness ) की कोई सूरत न पाई गई लिहाजा फर्ज तर्क हुआ ( छुटा ) और नमाज़ बातिल नष्ट हो गई
{ रदूदुल मोहतार, फतावा रजविया जिल्द 3 सफहा 408 मोमीन की नमाज़ पेज 359 }

( 91 )【मस’अला】रुकूअ या सज़दे में मुक़्तदी ने इमाम से पहले सर उठा लिया और इमाम अभी रुकूअ या सज़दे में है तो मुक़्तदी पर वापस लोटना वाजिब है और वापस लौटने की वजह से येह दो ( 2 ) रुकूअ या दो ( 2 ) सज़दे शुमार ( गिनती ,count ) नही होगे,{ आलमगीरी बहारे शरीअत हिस्सा 3 सफहा 139 }

दोस्तो ऐसे मसाइल खूब सेर करते जाए किया पता किस की नमाज़ सही हो जाय और उसका सवाब आप को मिले,

इन्शा अल्लाह पोस्ट जारी रहे गा

Photo by rawpixel on Unsplash

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